पिछले 200 वर्षों में विज्ञान ने प्रकृति के बहुत से रहस्यों से पर्दा उठाकर मानव जीवन को भौतिक जीवन की सभी सुख-सुविधा संपन्न बनाने मे...
कब और कहाँ जन्में बाबा किसी को पता नहीं –
देवरहा बाबा कब और कहाँ जन्में किसी को भी
ठीक से पता नहीं,पर इतना जरूर माना जाता है की बाबा काफी समय हिमालय में
तपस्या करने के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया नामक स्थान पर पहुंचे।
वहां वर्षों निवास करने के कारण उनका नाम “देवरहा बाबा” पड़ गया । अमरकंटक
में उन्हें अमहलवा बाबा भी कहा जाता है। बाबा की दिनचर्या में
खाना-पीना,कपड़ा आदि तो कुछ था ही नहीं। बाबा सिर्फ दूध और शहद का सेवन करते
थे। किसी ने बाबा को जल का सेवन करते हुए भी नहीं देखा। 12 फिट ऊंची लकड़ी
की मचान में रहने वाले बाबा का जीवन बस वहीं तक सीमित था। बाबा नदी में
स्नान के पश्चात घंटो-घंटो साधना में लीन हो जाते। कुछ समय के लिए भक्तों
और जिज्ञासुओं से भी मिलते और उनसे जमकर संवाद करते।
जो भी गया खाली हाँथ नहीं लौटा-
देवरहा बाबा अपने भक्तों के प्रति बड़े
उदार थे। जो भी श्रद्धालु बाबा के पास गया उसे कभी बाबा ने खाली हाँथ नहीं
लौटाया। खुद जीवन भर निराहार रहने वाले बाबा भर-भर छोहारे,रेवड़ी,बादाम,काजू
अपने भक्तों को खिलाते। इसमें भी सबसे ज्यादा अचरज पूर्ण बाद यह थी की
बाबा के मचान पर कभी किसी ने प्रसाद नहीं देखा। फिर भी सैकड़ों भक्तों को
प्रसाद बाबा कहाँ से लेते थे ये कभी कोई नहीं जान पाया। बाबा के पुराने
शिष्यों के मुताबिक़ बाबा खेचरी मुद्रा में पारंगत थे इसी कारण वे अपनी आयु
और निरोग को संचित कर पाने में सफल रहे थे। उन्हें किसी ने आवागमन करते भी
नहीं देखा फिर भी बाबा प्रयाग,बनारस और हिमालय आदि में दिखलाई दे ही जाते
थे।
देवरहा बाबा को वन्य प्राणियों और
पेड़ों,लताओं पुष्पों आदि से खासा लगाव था। आश्चर्य की बात यह है की बाबा
जहाँ भी रहते थे वहां काँटेदार बबूल भी अपने कांटे त्याग देते थे। वातावरण
में चारों ओर सिर्फ सुंगध ही सुंगध फ़ैली हुई होती थी। अपने दीर्घतम जीवनकाल
में बाबा अधिक समय प्रकृति की गोद में रहे कभी हिमालय की कंदराओं में तो
कभी गंगा और कभी यमुना जैसी पावन नदियों के किनारे अपनी घास-फूस की मचान
में। उनको जानवरों की भाषा भी समझ में आती थी। वे अपनी दृष्टि से ही आदमखोर
शेरों और हिंसक,बौराए हांथियों के समूहों को शांत कर देते थे। बाबा की
सेवा में बरसों रहें मार्कंडेय जी के मुताबिक़ बाबा किसी महिला के गर्भ से
नहीं बल्कि पानी से अवतरित हुए थे। यमुना के किनारे वृन्दावन में वह करीब
आधे घंटे तक पानी में बिना सांस लिए रह सकते थे।
कई ख्याति प्राप्त राजनीतिक हस्तियाँ रहीं बाबा की शरण में –
भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र
प्रसाद और डॉ.जाकिर हुसैन, इंग्लैण्ड के जॉर्ज पंचम, लालबहादुर शास्त्री,
पण्डित जवाहर लाल नेहरू,इंदिरा गाँधी और उनके पुत्र राजीव गाँधी जैसी
राजनीति क्षेत्र की अनगिनत प्रसिद्द हस्तियाँ बाबा के दरबार में हाजिरी
लगाने पहुँचती थीं। राजेन्द्र बाबू सिर्फ दो वर्ष के थे जब वे देवरहा बाबा
के दरबार में अपने पिता के साथ पहुँचे थे। उनके मुख-मंडल को देखकर बाबा ने
भविष्यवाणी करते हुए कह दिया “यह बालक देश का राजा बनेगा”। कालांतर में
राष्ट्रपति बनने के बाद डॉ.राजेन्द्र प्रसाद ने विधिवत प्रयाग तट पर बाबा
का पूजन किया। देवरहा बाबा के सानिध्य में अक्सर बड़े-बड़े
वेदांती,आयुर्वेदाचार्य,वैज्ञानिक और योगाचार्य आदि देखे जा सकते थे। बाबा
सबसे खुलकर और खिलखिलाते हुए चर्चा करते थे। सभी विषयों पर बाबा की पकड़
देखकर लोग अचंभित रह जाते थे। बाबा अपने सुपात्र भक्तों को अष्टांग योग भी
सिखाया करते थे।
गो-रक्षा और रामभक्ति के लिए प्रेरित करते रहे –
देवरहा बाबा भगवान राम के अनन्य भक्त थे।
गोमाता की रक्षा करने तथा भगवान की भक्ति में रत रहने की प्रेरणा देते थे।
उनका मानना था की दिव्यभूमि भारत की समृद्धि गोरक्षा,गो-संवर्धन के बिना
संभव नहीं है। भारत निर्माण के लिए गोहत्या का कलंक मिटाना अत्यावश्यक है।
विश्व हिन्दू परिषद् के प्रमुख रहे स्वर्गीय श्री अशोक सिंहल से उन्होंने
बाबरी विध्वंस के पूर्व ही रामजन्म भूमि निर्माण की भविष्यवाणी कर दी थी।
हिंदुत्व के विरुद्ध षड्यंत्र की जड़े कितनी गहरी हैं इसका अंदाजा आप इसी से
लगा सकते हैं की इस महान ब्रह्मयोगी को भी जस्टिस लिब्राहन आयोग ने बाबरी
मस्जिद के विनष्टीकरण का दोषी माना था। जबकि 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद विघटन
से करीब ढाई वर्ष पूर्व ही 1990 की योगिनी एकादशी (19 जून) के पावन दिन पर
उन्होंने अपने ब्रह्मरंध्र को खोल कर निर्वाण का वरण कर लिया था।
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