जानिए सूर्यपुत्र कर्ण के पिछले जन्म के कुछ ऐसे कर्म जिसके कारण उनका जीवन संघर्ष पूर्वक रहा !!

महर्षि व्यास कृत महाभारत एक ऐसा पवित्र ग्रंथ है जिसमें अनेक घटनाएं संकलित हैं, जो आज भी मनुष्य को जीवन में सत्य के मार्ग पर चलने के ल...

महर्षि व्यास कृत महाभारत एक ऐसा पवित्र ग्रंथ है जिसमें अनेक घटनाएं संकलित हैं, जो आज भी मनुष्य को जीवन में सत्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है। कौरव और पांडवों के बीच उस महायुद्ध के बारे में यूं तो सब जानते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि उस युद्ध में अनगिनत योद्धाओं और सैनिकों की मृत्यु हुई थी जिसके कारण कुरुक्षेत्र की भूमि आज भी लाल पाई जाती है।


महाभारत की कुछ ऐसी ही रोचक कहानियां
यु तो महाभारत की कहानियां आप सुनते और टेलीविजन के माध्यम से देखकर सीखते रहते हैं, लेकिन वहां हमें सब कुछ जानने को नहीं मिलता। आज हम आपको कुछ ऐसी ही कहानियों से अवगत करवाएंगे।
  सूर्यपुत्र कर्ण का पूर्व जन्म
कुंती पुत्र होने के कारण कर्ण भी सही मायने में पांडव था। सबसे जेष्ठ पुत्र भी करण ही था, लेकिन हालातों ने कुछ ऐसा खेल खेला जिसके कारण करण एक सूत पुत्र बन गया और एक महान धनुर्धर होने के बावजूद भी उसको वह सम्मान नहीं मिल सका।

 
धर्म के पथ पर चलना
करण सदैव धर्म की राह पर चलता था। वह एक समर्पित योद्धा था, लेकिन इसके बावजूद भी करण ने अन्याय करने वाले दुर्योधन का साथ अपनी अंतिम सांस तक दिया। करण ने अपनी पूरी जिंदगी में दुख ही सहे।
क्या आप जानते हैं इसका कारण उसके पूर्व जन्म में किए हुए कुछ पापों का नतीजा था
असुर दंबोघव
दंबोघव नाम के एक असुर ने सूर्यदेव की बेहद कठिन तपस्या की और सूर्यदेव से एक वरदान हासिल किया कि उसे सौ कवच हासिल होंगे। इन कवचो पर केवल वही व्यक्ति प्रहार कर सकता था जिसने इसमें हजारों वर्षों तक तप किया हो। उसने भगवान सूर्य से यह भी वरदान मांगा था कि अगर कोई उसके कवच को भेदने का प्रयास करें तो उसकी उसी क्षण मृत्यु हो जाए।


सूर्यदेव असुर के तप से बेहद प्रसन्न थे और दंबोघव को तप का फल तो मिलना ही था। भगवान सूर्य ने उसे उसका मनचाहा वरदान दे दिया। उसके पश्चात वह असुर सहस्त्र कवच के नाम से जाना जाने लगा।
वरदान को पाते ही दंबोघव ने हाहाकार मचा दिया। जंगलों का विनाश करना, महा ऋषियों की तपस्या भंग करना तो जैसे उसका रोज का कार्य सा बन गया। जब उसका प्रकोप हद से ज्यादा बढ़ गया तो प्रजापति दक्ष की पुत्री मूर्ति, जिनका विवाह धर्म से हुआ था जो ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक थे, ने भगवान विष्णु की आराधना की और उनसे सहस्त्र कवच के अंत का वरदान मांगा।
भगवान विष्णु जी ने भी उन्हें वरदान देते हुए कहा कि वह स्वयं सहस्त्र कवच का अंत करेंगे मगर जिस का माध्यम मूर्ति ही होगी। कुछ समय बीत जाने के बाद मूर्ति ने दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया, जिनका नाम नर-नारायण था। जिनके शरीर तो दो थे लेकिन मन, विचार, कर्म एक समान थे।
इन्हीं दोनों ने मिलकर सहस्त्र कवच का अंत किया। जब नर कवच के साथ युद्ध कर रहे थे तो नारायण कठोर तप में लीन हो गए। नर ने सहस्त्र कवच के 999 कवच भेद दिए। जब केवल एक कवच रह गया था तो सहस्त्र कवच ने भागकर सूर्य लोक में शरण ले ली।
उसके पीछे-पीछे नर नारायण दोनों सूर्य लोग पहुंचे, और सूर्यदेव से असुर को अपनी शरण से बाहर निकलने की विनती की। तब सूर्य देव ने कहा:
“हे ईश्वर! दंबोघव एक बुरी आत्मा है मैं इस बात से अवगत हूं, लेकिन उसने अपने कवच एक कठोर तप करके हासिल किए हैं। उस तपस्या का फल उससे छीनना बेइंसाफी होगी।”
यह बात सुनकर नर को बेहद क्रोध आया और क्रोधित होकर नर ने सूर्यदेव और दंबोघव को शाप दिया कि अगले जन्म में तुम दोनों को इस दुष्ट कर्म का दंड भोगना होगा। जब द्वापर युग आया तो सूर्य देव के वरदान से ही जो कुंती को पुत्र हुआ था वह कोई और नहीं बल्कि दंबोघव था। जिसका केवल एक कवच बाकी था। इसी कर्मो का दण्ड सूर्यपुत्र करण ने महाभारत काल में भुगता।
महाभारत की एक और रोचक कहानी
जब पांडवों ने कौरवों से जुए के खेल में अपना सब कुछ गवा दिया और 13 वर्ष के वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास पर गए। तभी 13 वर्ष तो जैसे तैसे  बीत गए लेकिन, जो 1 साल का अज्ञातवास था उसकी कौरवों द्वारा एक शर्त थी कि अगर उस अज्ञातवास के दौरान किसी ने पांडवों को पहचान लिया तो उन्हें फिर से वनवास पर जाना होगा।

पांचों पांडवों ने वेश बदल लिया अपना और वह विराटनगर के राजा विराट के महल में रहने लगे। पांचों ने अपना नाम भी बदल दिया। द्रोपदी ने अपना नाम मालिनी किया और विराट नगर की रानी सुदेशना की केश सज्जा का कार्य संभाल लिया।
सुदेशना का एक भाई था जिसका नाम था कीचक, वह विराटनगर की सेना का सेनापति भी था। कीचक बेहद शक्तिशाली व्यक्तित्व का मालिक था। वह रानी का भाई होने का फायदा उठाने से कभी चूकता नहीं था। उसकी सबसे बड़ी कमजोरी सोंदर्य से भरी हुई स्त्री थी। जब उसने पहली बार द्रोपदी को महल में देखा तो मंत्रमुग्ध हो गया। वह द्रोपदी को पाना चाहता था। उसे अपनी रानी बनाना चाहता था, लेकिन द्रोपदी ने उस का प्रस्ताव ठुकरा दिया। एक बार किसी बहाने से उस ने द्रोपदी को अपने कक्ष में बुलाया और उसके साथ गलत व्यवहार किया। उसी महल में रसोइए के तौर पर भीम भी कार्य करते थे। भीम ने वहां आकर द्रोपदी के सम्मान की रक्षा की।
उसके पश्चात जब यह घटना की जानकारी बाकी सब पांडवो को पता चली तो उन्होंने कीचक को उसकी करनी की सजा देने की ठान ली। उन्होंने कीचक के वध करने की योजना बनाई। उसी योजना के अनुसार एक बार पांडवों ने कीचक को बाहर घने अंधेरे में घेर लिया और उस पर प्रहार शुरू कर दिया। महल के भीतर कीचक के चीख-पुकारने की आवाज ना जाए इसके लिए महल में उपस्थित अर्जुन, जो कि नृत्य शिक्षिका के तौर पर वहां रह रहे थे, ने जोर-जोर से मृदंग बजाना शुरू कर दिया। भीम ने कीचक के शरीर के अंगों को अलग-अलग काट दिया और उसकी निमन मानसिकता का दंड दिया।

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अज़ब-गज़ब: जानिए सूर्यपुत्र कर्ण के पिछले जन्म के कुछ ऐसे कर्म जिसके कारण उनका जीवन संघर्ष पूर्वक रहा !!
जानिए सूर्यपुत्र कर्ण के पिछले जन्म के कुछ ऐसे कर्म जिसके कारण उनका जीवन संघर्ष पूर्वक रहा !!
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