1857 के स्वाधीनता संग्राम में शामिल महंतों की वह गाथा जिसे आपने शायद ही सुना होगा

हम सभी ने आजादी की पहली लड़ाई सन् 1857 के विद्रोह के बारे में तो सुना ही होगा जिसमें क्रांतिकारी मंगल पांडे, कुवंर सिंह, तात्...

हम सभी ने आजादी की पहली लड़ाई सन् 1857 के विद्रोह के बारे में तो सुना ही होगा जिसमें क्रांतिकारी मंगल पांडे, कुवंर सिंह, तात्या टोपे, नाना साहब पेशवा समेत कई क्रांतिकारियों ने जान की बाजी लगा दी थी। इस आजादी की लड़ाई में एक और महत्वपूर्ण भूमिका झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की भी थी जिन्होंने अपने अंत समय तक अंग्रेजों से लोहा लिया और लड़ते लड़ते ग्वालियर पहुँच कर शहीद हो गई। अंग्रेज झाँसी की रानी के पार्थिव शरीर पर भी कब्जा करना चाहते थें जिससे वह विरोधियों के मन में डर पैदा कर सकें। लेकिन आजादी की उस लड़ाई में एक महत्वपूर्ण भूमिका उन साधुओं की भी थी जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के शव की रक्षा करते करते प्राणों की आहुति दे दी।

India this year celebrates the Centenary of the Indian Mutiny of 1857. The Indians call it the "first war of Independence. This painting in the Allahabad museum depicts the Rani Jhansi riding into battle against the British forces, her bay perched behind the saddle. The Rani gained legendary fame when she led her men personally after deciding to throw in her lot with the sepoys. She has become Indian's Joan of Arc. Films have been made of her life. Heroic paintings and statues have been executed in her honour. (AP-Photo/HO)

संत रामानंदाचार्य के निर्मोही अखाड़े के 1200 साधु वो वीर योद्धा थें जिन्होंने इस मुश्किल कार्य को करने में अपनी जान की बाजी लगा दी थी। इस अखाड़े के नौवें महंथ गंगादास ने रानी लक्ष्मीबाई को दिए हुए दो वचन जो उनके पुत्र दामोदर की रक्षा और रानी की मृत्यु की स्थिति में रानी के शव की अंग्रजों से रक्षा थे उनको पूरा करने के लिए 1200 साधुओं के साथ अंग्रेजी हुकुमत से दो दो हाथ किए थे। इस लड़ाई में 745 साधुओं ने वीरगति प्राप्त की थी जिनकी समाधियां रानी लक्ष्मीबाई की समाधी के साथ इस शाला में मौजूद हैं। शहीदों के बलिदान को याद करते हुए यहां अखंड ज्योति जलती रहती है और हर साल 18 जून को मनाए जाने वाले संत शहीदी दिवस में देश भर के लोग शामिल होते हैं।

Gwalior


यादगार के तौर पर संतो द्वारा युद्ध में इस्तेमाल किए गए तलवार, भाले और चिमटे सुरक्षित रखे गए हैं जिनमें 1857 स्वाधीनता संग्राम में प्रयोग हुई एक तोप भी शामिल है जिसे हर साल विजयादशमी को चलाया जाता है। 17 वीं शदी में बनी यह तोप आज भी बिना किसी परेशानी के गोले दागने का काम करती है। जिस पीठ में ये समाधियां बनी हुई हैं उस पीठ के संस्थापक महंत परमानंद गोसांई एक सिद्ध महंत थे जो योग के माध्यम से अपने शरीर के अंगों को भी अलग अलग कर देते थे। मुगल सम्राट अकबर को भी महंत के सामने अपने सर झुकाने पड़ गए थे जब महंत ने अकबर को अपनी इस योग विद्या का नमूना दिखाया था। घटना कुछ ऐसे हुई कि शंख और आरती की ध्वनियों से परेशान होकर अकबर ने अपने कुछ सैनिकों को लेकर मठ पर चढ़ाई की थी लेकिन महंत परमानंद गोसांई की योग सिद्धी ने अकबर को शस्त्र डालने पर मजबूर कर दिया था।

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